धार जेल में बंदी की मौत मामला : हाईकोर्ट ने न्यायिक जांच और एफआईआर को वैध ठहराया

जेल अधीक्षक समेत अन्य की याचिकाएं खारिज, निष्पक्ष जांच जारी रखने के निर्देश

जेल सहित कई अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में, मेडिकल रिकॉर्ड और पोस्टमार्टम पर भी उठे सवाल

धार। जिला जेल धार में बंदी भैरू पिता बगदीराम की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच और उसके आधार पर दर्ज एफआईआर को वैध माना है। अदालत ने जेल अधीक्षक राजाराम डांगी समेत अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की ओर से दायर दो रिट याचिकाएं खारिज करते हुए जांच एजेंसी को निष्पक्ष तरीके से आगे की जांच जारी रखने के निर्देश दिए हैं।

मामला 27 फरवरी 2023 का है। उपलब्ध जांच रिपोर्ट के अनुसार, जेल में तलाशी के दौरान प्रतिबंधित सामग्री मिलने के बाद बंदी भैरू के साथ कथित मारपीट की गई थी। जांच में बंदियों ने आरोप लगाया कि उसे डंडों और पट्टे से पीटा गया तथा उसकी छाती पर पैर रखा गया। इसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।

धारा 176(1-A) के तहत हुई न्यायिक जांच

हिरासत में मौत होने के कारण प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के निर्देश पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी राजकुमार गौड़ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1-A) के तहत जांच शुरू की थी। जांच में पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड, बंदियों और परिजनों के बयान, जेल दस्तावेज, पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सहित विभिन्न साक्ष्यों का परीक्षण किया गया। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 3 अप्रैल 2023 को जांच रिपोर्ट प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंप दी थी।

मेडिकल रिकॉर्ड और पोस्टमार्टम पर भी उठे सवाल
जांच रिपोर्ट में भैरू के शरीर पर चोटों के संकेत और कई चोटों का उल्लेख किया गया है। घायल बंदी अरविंद की मेडिकल जांच में भी पीठ और जांघ के पीछे चोटें मिलने की बात दर्ज की गई। वहीं मजिस्ट्रेट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को असंगत, अधूरा और अस्पष्ट माना। मेडिकल दस्तावेजों में स्पष्टता की कमी के चलते मृत्यु के कारण का निर्धारण कठिन होने की बात कही गई।

पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी को लेकर भी जांच में सवाल उठे। रिपोर्ट के अनुसार, दो अलग-अलग रिकॉर्ड सामने आए, जिनमें पहली सीडी धुंधली और अस्पष्ट बताई गई, जबकि बाद में प्रस्तुत सीडी अधिक स्पष्ट थी। जांच रिपोर्ट में संबंधित पुलिस अधिकारी और जेल प्रशासन की भूमिका की भी जांच की आवश्यकता बताई गई है।

कई अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में
न्यायिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर जेल प्रहरी ओंकार चौहान, जेलर श्याम वर्मा, जेल प्रहरी अब्दुल रज्जाक खान और जेल प्रहरी मुकेश सोलंकी पर भैरू के साथ मारपीट कर उसकी मृत्यु कारित करने का आरोप लगाया गया और उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 और 201 के तहत मामला दर्ज किया गया।

जेल अधीक्षक राजाराम डांगी के संबंध में जांच रिपोर्ट में घटना के दौरान मौके पर पहुंचने तथा कर्मचारियों को मारपीट रोकने के लिए कहने का उल्लेख है। हालांकि, घायल भैरू को तत्काल पानी या चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराने को लेकर उनके विरुद्ध गंभीर लापरवाही और लापरवाही से मृत्यु कारित करने के आरोप में धारा 304 के तहत कार्रवाई की अनुशंसा की गई। संबंधित चिकित्सकों और तत्कालीन थाना प्रभारी की भूमिका पर भी जांच रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

एफआईआर को चुनौती देने हाईकोर्ट पहुंचे थे अधिकारी

जेल अधीक्षक और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में धारा 176(1-A) के तहत हुई न्यायिक जांच तथा जांच रिपोर्ट के आधार पर दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि मजिस्ट्रेट का अधिकार केवल मृत्यु के कारण का पता लगाने तक सीमित था और वह व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि पुलिस या न्यायिक हिरासत में हुई मौत को सामान्य मृत्यु नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में जांच का दायरा केवल मृत्यु के कारण तक सीमित नहीं है, बल्कि हिरासत में व्यक्ति के साथ क्या हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार हो सकता है, इसकी जांच भी आवश्यक है।

एफआईआर रद्द करने से किया इनकार
अदालत ने मृतक के शरीर पर चोटों के संकेत, घायल बंदी की मेडिकल रिपोर्ट, बंदियों के बयान, समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिलने के आरोप, पोस्टमार्टम रिकॉर्ड की कथित अस्पष्टता और वीडियोग्राफी की गुणवत्ता सहित विभिन्न पहलुओं को प्रथम दृष्टया महत्वपूर्ण माना। इन परिस्थितियों में एफआईआर को शुरुआती स्तर पर रद्द करना आपराधिक न्याय प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप होगा, इसलिए दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

अंतिम दोष अभी तय नहीं
हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि मामले में आरोपित अधिकारियों और कर्मचारियों को दोषी ठहरा दिया गया है। अदालत ने इस चरण पर केवल न्यायिक जांच और एफआईआर की वैधता को बरकरार रखा है। अब जांच एजेंसी को मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, वीडियोग्राफी, सीसीटीवी फुटेज, बंदियों के बयान और जेल रजिस्टर सहित उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करनी होगी। आरोप तय होने और दोषसिद्धि का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा।

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